किसी गर्भाशय में नौ महीने
रह कर नहीं जन्मता है वो
न है बैठता है गिद्ध की तरह
किसी सूखे वृक्ष पर मुर्दे के इंतज़ार में
दुख में इंतज़ार
इंतज़ार में दुख
बहुत फर्क है लेकिन
वह वहाँ भी नहीं होता
सांस छोड देने के बाद
सांस लेने के लिये उतावले
फेफडों के अंकुचन - संकुचन
मे भी नहीं होता
कहीं नहीं होता है वह
न खाली होने पर
न भरे होने पर
मगर वो होता है हर कहीं
विडम्बना की तरह
बाकी सब उसी के लिए होता है
धूप…हवा…हँसी… जीवन..
सब उसी के लिए होता है
उसी के प्रतिरोध में
प्रतिरोध उमंग है उल्लास है
प्रतिरोध जीवन है सांस है
और प्रतिरोध का भी दुख होता है
जैसे दुख का प्रतिरोध होता है
कुछ ऐसे जैसे तुम हो
जैसे मैं हूँ
जैसे हम दोनों नहीं है दुख हैं…
जैसे हम दोनों नहीं है प्रतिरोध हैं…

February 6th, 2009 at 2:07 pm
magar vo hota hai har kahin vidanvnaa ki tarah bahut khub kaha hai
February 6th, 2009 at 2:10 pm
अच्छी पोस्ट है।
February 6th, 2009 at 2:21 pm
बहुत खूब अवनीश जी।
दु:ख का सच अच्छी तरह से स्पष्ट किया है आपने।
बधाई!
February 6th, 2009 at 2:48 pm
Waah ! bahut sundar bhaav aur abhivyakti…
February 6th, 2009 at 4:19 pm
अच्छा लगा पढ़कर, अभिव्यक्ति और प्रस्तुति दोनों सुंदर है !
February 27th, 2009 at 4:46 pm
dukh sukh jeevan maut tassalli
waqt bhatakna aur fasaane
sab kuchh tere jaise honge
sab kuchh mere jaise honge
June 9th, 2010 at 7:02 pm
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