कल-कल कोलाहल

एक सैलानी चहक
नाव में बैठ कर
नदी के उस पार चली गई

मल्लाह की हथेली में
घट्ठे हैं दुख

धोबी पछीटता है
बेरहमी से कपडे
पानी में घुलता है
जाने कितना दुख

पानी में बहते हैं बहाए गए दुख
कल-कल कल-कल

फकीर गाता है मुक्ति का गीत
मुक्ति का गीत गाते है सौदागर भी
जल्लाद और सरकारें भी

मल्लाह लगाता है उगलियों में
गर्म कड्वा तेल
गाता है बिरहा

नदी चुपचाप सुनती है
कल-कल कोलाहल.

One Response

  1. Manish Khattry Says:

    gr8 words… n’ meaning…
    keep it up….

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