भोलापन जाता रहा
जैसे-जैसे बढ़ती रही धूप।
जैसे-जैसे दिखने लगा
ढाँक-तोप कर रक्खा हुआ।
जैसे-जैसे बढ़ता रहा सन्नाटा।
जैसे-जैसे सुनाई देने लगा
बहुत सारा अनकहा
बहुत सारा
जबरदस्ती ख़ामोश कराया हुआ।
जैसे-जैसे बढ़ती रही बारिश
जैसे-जैसे उतरने लगे रंग
जैसे-जैसे रपटीले होने लगे रास्ते
जैसे-जैसे टपकने लगीं छतें
हर चोट के साथ
धातु का मामूली टुकड़ा लेता है आकार
कोई बनता है सन्दूक
कोई बनता है ताला
मैं बनता हूँ चाभी
अपने समय के हथौड़े से लड़ते हुए।

August 13th, 2008 at 1:43 pm
..मैं भी .. [ बहुत ही बढ़िया - आपका पूरा कवित्त पढ़ रहा हूँ - यहाँ- इस से बिना कुछ कहे जाना मुनासिब नहीं था - बहुत खूब ] साभार- मनीष