सिगरेट की तरह उँगलिओं में फंसा
तुम्हारा नाम सुलगता है
हर कश के साथ जलता है जिगर
और चढता है नशा
सारे कमरे में भर जाती हो
जब धुँए की तरह तुम
तब मिलता है सुकून
हर सांस के साथ आती जाती हो तुम
जानता हूँ यह धुँआ धोखा है
हाथ नहीं आएगा
फिर भी न जाने क्यों पीता हूँ
यह ज़िन्दगी.
*रचनाकाल: 1995.
