मुद्दतों बाद फिज़ा बदली है
आज होठों पे’ हँसी असली है
सूत रिश्तों का घेर लेता है
सूत कच्चा है इंसा तकली है
मेरा माज़ी गुज़र गया शायद
वो यह कहती है कैसी पगली है
राह भटके तो खो गई मंज़िल
कहने वालों की बात नकली है
जिस्म नीला पड़ा है मछली का
प्यास होगी इधर से निकली है
