उत्तर-कथा
December 20th, 2007

भोलापन जाता रहा
जैसे-जैसे बढ़ती रही धूप।
जैसे-जैसे दिखने लगा
ढाँक-तोप कर रक्खा हुआ।

जैसे-जैसे बढ़ता रहा सन्नाटा।
जैसे-जैसे सुनाई देने लगा
बहुत सारा अनकहा
बहुत सारा
जबरदस्ती ख़ामोश कराया हुआ।

जैसे-जैसे बढ़ती रही बारिश
जैसे-जैसे उतरने लगे रंग
जैसे-जैसे रपटीले होने लगे रास्ते
जैसे-जैसे टपकने लगीं छतें

हर चोट के साथ
धातु का मामूली टुकड़ा लेता है आकार
कोई बनता है सन्दूक
कोई बनता है ताला
मैं बनता हूँ चाभी
अपने समय के हथौड़े से लड़ते हुए।

जैसे
बिना नमक के
नहीं बनती है दाल

जैसे
बिना अक्षर के
नहीं बनती है किताब

जैसे
बिना कदम के
नहीं बनते हैं रास्ते

जैसे
बिना मिट्टी के
नहीं बनती है दुनियाँ
वैसे ही मैं बनता हूँ
थोडी सी मामूली मगर ज़रूरी चीजों से

गैलीलियो
December 3rd, 2007

उन दिनों तुम
छोटे-छोटे मोजे बुना करती थीं
और मैं ढूँढ़ता फिरता था एक पालना।

तब हम दोनों की एक ही चिंता थी
कि कैसे यह गोल-मटोल सी प्यारी सी दुनिया
हँसती रहे हमेशा।

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