ज़िन्दगी का हिसाब दीजिये
मौत को अब जवाब दीजिये.

रुख पलटने से क्या फाईदा
दिख गया सब नक़ाब दीजिये.

Read the rest of this entry »

कभी हो ऐसा
October 17th, 2007

कभी हो ऐसा
मैं बैठा देखता रहूँ उस दरख्त को
और उस दरख्त से कोई पत्ती न झडे
बल्कि अँखुआ जाए एक कली
मेरे पास वाली टहनी पर

कभी हो ऐसा
माँ झट्क कर झाड दे धूप की चादर
और खन्न से गिरे एक सूरज
माँ बाँध ले उसे आँचल के कोने से

Read the rest of this entry »

कूडेदान
October 11th, 2007

दरवाजा खोलता हूँ तो
घर में घुस आती है सडक
आल्मारियों में बैठ जाता है बाज़ार
घर के हर सदस्य के कमरे के बाहर
जलती है लाल बत्तीटीवी खोलता हूँ
तो कमरे में लग जाती है दुकान
सदी के सबसे बडे नायक और
सबसे नीच विचार पूरी दुनियाँ को
बेचने के लिये लगाते हैं हाँका

Read the rest of this entry »