सीता धरती में समा जाने के बाद

पूछती है पृथ्वी से

क्या इसी दिन के लिये सहे मैंने इतने संताप

कौन था वो?

जिसने धनुष तोड कर जीता मुझे

पृथ्वी के भीतर धधकता है लावा

शबरी भटकती है जंगलों में अकेली

गूँजता है उसका विलाप

जूठे बेरों की झूठी कहानी हो रामा, राजा के भवनवा

बनिगे तुम् राजा सुधि हमरी बिसरानी, राजा के भवनवा

केवट गुस्से में धोता है अपनी नाव

कौन बैठा था इस पर?

क्या वही? क्या वही?

अहिल्या पिच्च से थूकती है

किसने छुआ था मुझे?

और वह भी पैरों से

क्या मतलब है इस मर्यादा का?

कैसा है यह उत्तम पुरूष?

शम्बूक अपना कटा सिर उठा कर

युद्ध की घोषणा करता है

संजय बताता है धृतराष्ट्र को

सिसकियाँ आग में तब्दील हो रही हैं महाराज!

कोई नहीं रोक पा रहा है उन्हें न घंटे न घडियाल!

धृतराष्ट्र सुनता है आत्मलीन

राम नाम सत्य है.. राम नाम सत्य है

एक शवयात्रा गुज़र रही है

उस काल से इस काल तक.

तुम चली गई हो
लेकिन अपनी उगलियाँ इन हवाओं में भूल गई हो
ये बेवज़ह उलझा देतीं हैं मेरे बाल

फिर सुलझाने भी लगतीं हैं बडी नर्मी से
बस तुम्हारी ये उगलियाँ मेरे हाथों में नहीं आतीं

तुम आओ तो तुम्हारा हाथ थामूँ

मछलियाँ रो रही हैं पानी में

कितना पानी बचा है पानी में

कश्तियाँ रूठ कर हैं औधी पडी

तीर बहने लगे है पानी में

आँख सहमी है गम बरसता है

दर्द भरने लगा है पानी में

यह कतई ज़रूरी नहीं कि हमेशा कुछ गम्भीर ही लिखा जाए

पेश हैं कुछ खुराफातें

1

प्यार के पन्ने पीले पड गए इश्क़ की स्याही सूख गई

उसने ऐसी लंगी मारी दिल की हड्डी टूट गई

2

रंग उडते नहीं हैं यादों के

भूत जाते नहीं हैं लातों के

तुमको हँसना था मुझ पर तुम हँस लिए

तुम हँसे पर क्यों बताओ किस लिए

ऊँगलियाँ खुद पत्थरों पर बेसबब घिसती रहीं

मोम हो पत्थर कोई पर बताओ किस लिए

यूँ ही कोई  रो पडेगा कोई चुप हो जाएगा

दर्द है बढता रहेगा पर बताओ  किस लिए

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