सीता धरती में समा जाने के बाद
पूछती है पृथ्वी से
”क्या इसी दिन के लिये सहे मैंने इतने संताप
कौन था वो?
जिसने धनुष तोड कर जीता मुझे”
पृथ्वी के भीतर धधकता है लावा
शबरी भटकती है जंगलों में अकेली
गूँजता है उसका विलाप
”जूठे बेरों की झूठी कहानी हो रामा, राजा के भवनवा
बनिगे तुम् राजा सुधि हमरी बिसरानी, राजा के भवनवा”
केवट गुस्से में धोता है अपनी नाव
“कौन बैठा था इस पर?
क्या वही? क्या वही?”
अहिल्या पिच्च से थूकती है
“किसने छुआ था मुझे?
और वह भी पैरों से
क्या मतलब है इस मर्यादा का?
कैसा है यह उत्तम पुरूष?”
शम्बूक अपना कटा सिर उठा कर
युद्ध की घोषणा करता है
संजय बताता है धृतराष्ट्र को
”सिसकियाँ आग में तब्दील हो रही हैं महाराज!
कोई नहीं रोक पा रहा है उन्हें न घंटे न घडियाल!”
धृतराष्ट्र सुनता है आत्मलीन
“राम नाम सत्य है.. राम नाम सत्य है”
एक शवयात्रा गुज़र रही है
उस काल से इस काल तक.
