दो हज़ार छह बरस बीत गए ईसा
लेकिन तुमहरी सलीब अब भी चमकदार
अभी भी प्यासी है ख़ून की

दो हज़ार छह बरस बीत गए ईसा
लेकिन अभी भी डरता है प्यार, होते हुए
इंसान एक पुरानी नाव है जिसकी लकड़ी सील चुकी है
दो हज़ार छह बरस पुरानी पतवारें भी अब नही चलतीं
जैसे बाहें खुली है पर बुलाती नही
कीलें चुभतीं है एसे

बस यही एक बात है
और एह दो हज़ार सातवाँ बरस है
तुम्हारी सलीब टूटे तो
एक नाव बने इस बरस..