एक विदूषक की तरह
किसी तरह अपना दिन निपटा कर लौटूँगा अपने रैन बसेरे में
वहाँ के लोग पूछेगे मेरा हाल - चाल
और सभी की तरह मैं भी कहूँगा ठीक ठाक हूँ बिल्कुल
ज़वाब में सब मुस्कुराएंगे ठीक वैसे ही
जैसे मैं मुस्कुरौंगा
हम में से कुछ पीयँगे दारू
गाली देंगे रात भर दुनिया को
एक पीएगा सिगरेट ख़ासेगा रात भर
कोई गीत गाएगा अपनी बेसूरी आवाज़ में
कोई कंबल ओढ़ कर चुपचाप रोएगा
कोई अंडे के लीफ़ाफ़े को फाड़ कर पढ़ेगा
ख़बरें शिकायत करेगा
अख़बार वाले मेरे गावं की ख़बरें कियों नही छापते
वहाँ भी तो होते हैं बलात्कार
वहाँ भी अत्याचार किए जाते हैं अन्तहिन
वहाँ भी लगता है मेला
वहाँ भी नाचती है राधारानी
और याना गुप्ता से भी बहुत बढ़िया
मैं किसी तरह सोने की जुगत लगा उँगा
मेरी रज़ाई के साथ सपने संकाल और ताले में बंद होंगे
एक चाभी जिसे मैं अभी तक चोरी जाने से बचा पाया हूँ
उससे उस आलमारी को खोलूँगा
और निकल कर ओढुंगा वह राजाई
जिसमें इस रात की ठंड से बचने की गर्मी और सपने अभी तक भरे हुए हैं
