विदूषक
October 17th, 2006

एक विदूषक की तरह
किसी तरह अपना दिन निपटा कर लौटूँगा अपने रैन बसेरे में
वहाँ के लोग पूछेगे मेरा हाल - चाल
और सभी की तरह मैं भी कहूँगा ठीक ठाक हूँ बिल्कुल
ज़वाब में सब मुस्कुराएंगे ठीक वैसे ही
जैसे मैं मुस्कुरौंगा

हम में से कुछ पीयँगे दारू
गाली देंगे रात भर दुनिया को
एक पीएगा सिगरेट ख़ासेगा रात भर
कोई गीत गाएगा अपनी बेसूरी आवाज़ में
कोई कंबल ओढ़ कर चुपचाप रोएगा
कोई अंडे के लीफ़ाफ़े को फाड़ कर पढ़ेगा
ख़बरें शिकायत करेगा
अख़बार वाले मेरे गावं की ख़बरें कियों नही छापते
वहाँ भी तो होते हैं बलात्कार
वहाँ भी अत्याचार किए जाते हैं अन्तहिन
वहाँ भी लगता है मेला
वहाँ भी नाचती है राधारानी
और याना गुप्ता से भी बहुत बढ़िया

मैं किसी तरह सोने की जुगत लगा उँगा
मेरी रज़ाई के साथ सपने संकाल और ताले में बंद होंगे
एक चाभी जिसे मैं अभी तक चोरी जाने से बचा पाया हूँ
उससे उस आलमारी को खोलूँगा
और निकल कर ओढुंगा वह राजाई
जिसमें इस रात की ठंड से बचने की गर्मी और सपने अभी तक भरे हुए हैं

उस दिन सबने देखे बुरे सपने
एसा सच्चा था वह दिन

ताज़ा हमिला हुई औरतों ने देखा
उनके पेट में पल रहा था आदमखोर

तुरंत पैदा हुए बच्चों ने देखा
उनकी माँ के शरीर पैर नही था एक भी वस्त्र

गिद्धों ने देखा ताज़े माँस का सपना

गधों ने देखा क्षितिज तक फैला हुआ था कपड़ों का अंबार

प्यार के साथ चल रहे थे बाज़ीगर

भूखे किसान लील रहे थे चिप्स के पैकेट

एक लाश पेड़ पे ट्गी हुई चैन की बाँसुरी बजा रही थी

रोने को एक मादक संगीत की तरह सुना जा रहा था

ना जाने कौन सा दिन था की
हर सपना सच बोलता जा रहा था