मुद्दतों बाद फिज़ा बदली है
आज होठों पे’ हँसी असली है

सूत रिश्तों का घेर लेता है
सूत कच्चा है इंसा तकली है

मेरा माज़ी गुज़र गया शायद
वो यह कहती है कैसी पगली है

राह भटके तो खो गई मंज़िल
कहने वालों की बात नकली है

जिस्म नीला पड़ा है मछली का
प्यास होगी इधर से निकली है

मंडी रैप
June 30th, 2008

भीड भडक्का
शोर सडक का
बैगन भरता
दाल तडक्का
घंटी शंटी रेलम्पेल
मची है कैसी ठेलमठेल
आओ मिल कर बेंचे तेल

दान धरम
ईमान के धंधे
पापी नीच
बे ईमान
ये गन्दे
खेले मिल कर मौत के खेल
आओ मिल कर बेंचे तेल

अन्नो बन्नो
शबनम शन्नो
राधा रानी
देवी दुखियारी
सबको बना दिया है रेल
आओ मिल कर बेंचे तेल

अरबन शरबन
गरिबा गुरुबन
चले जा रहे
आँखे मीचे
धक्कमपेल लगी है सेल
आओ मिल कर बेंचे तेल

एक सैलानी चहक
नाव में बैठ कर
नदी के उस पार चली गई

मल्लाह की हथेली में
घट्ठे हैं दुख

धोबी पछीटता है
बेरहमी से कपडे
पानी में घुलता है
जाने कितना दुख

पानी में बहते हैं बहाए गए दुख
कल-कल कल-कल

फकीर गाता है मुक्ति का गीत
मुक्ति का गीत गाते है सौदागर भी
जल्लाद और सरकारें भी

मल्लाह लगाता है उगलियों में
गर्म कड्वा तेल
गाता है बिरहा

नदी चुपचाप सुनती है
कल-कल कोलाहल.

किसी एक दिन
जब किसी खोई हुई बूँद को
ढूढती हुई बरस रही होगी बारिश
हम किसी नामालूम सी जगह पर मिलेंगे

पत्थरों से निचुड रहा होगा पानी
कोई बीज अंखुआने की
उम्मीद में मरने वाला होगा
हम उसे एक सपने की तरह छुएगें

हम सदियों से औंधी पडी
एक नाव को नाव को सीधा करेगें
वहाँ तेज हवा होगी जिसमें
नाच रहे होंगे हमारे फेफडे

जब घनघोर गरज रहे होगे
बूढे जिद्दी बादल
हम हज़ारों बरस पहले भूली हुई
किसी भाषा में गीत गाऐगें

किसी एक दिन हम मिलेंगें ज़रूर
बस तुम भूलना मत

जब वे प्रेम करते थे
तब उनके आस-पास हिलकती थी नदी
दोनों इतने पारदर्शी थे
कि न तो वे दिखते थे न दिखती थी नदी

हवा में हिलते हुये धूप
उनके कपडों पर तितली की तरह मंडराती थी
इतने हल्के थे उनके वस्त्र
जैसे मछली की नर्म पूँछ होती है
बस उतनी ही सलवटें, उतनी ही धारियाँ,
उतनी ही नमी होती थी उन पर

जब वे प्रेम करते थे
तब मुस्कुरातीं थी मछलियाँ
मछलियों के मुस्कुराने पर
मछुए भी मुस्कुराते थे
मछुओं की मुस्कान काँटे की तरह
तिरछी हुआ करती थी
जिसे न वे जानते थे
न जानती थीं मछलियाँ

वे दोनों नदी के भीतर रहते थे
जैसे उन दोनों के भीतर रहती थी नदी

जब वे मरे…
तब जमीन स्वंय ले कर गई उन्हें श्मशान-भूमि
पेड चल कर आए उनकी चिता बनने
अग्नि की लपटों की तरह
पेडों से निकली पत्तियाँ हरहरा कर
जिसमें चिडियों ने अपने घोसले का एक तिनका
और अपने डैनों का एक पंख
उनकी अंतिम यात्रा के लिए रखा
हवा एक गिलहरी की साँसों मे शोकगीत गाने लगी
जिसका कोरस मैने अपनी साँसों में भी सुना

पानी जब उनकी अस्थियाँ लेने आया
तो मिट्टी का एक पात्र
लकडी की एक नाव
और सूत का वस्त्र
चुपचाप उसके साथ चला आया

यूँ हुआ उनका अंतिम-संस्कार
जो करते थे प्रेम
कि उनके बाद मछलियों ने
अपने बच्चों के नाम रखे उनके नाम पर
और उस दिन मछुआरों ने नहीं डाला
नदी में जाल.

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