रात होने से पहले
कहीं खो कर
जो लौट आते हैं
उन्हे क्या पता
रात की कसीदाकारी

देखो मेरे पूरे वज़ूद पर बने हैं
शानदार बेल-बूटे

सुईयां भी चुभी है बे-हिसाब
उनका दर्द है लाज़वाब

नहीं लौटना है मुझे कहीं
रात खत्म होगी तो
सुबह आ ही जाएगी

प्रेम
February 20th, 2009

बादलों की गड़गड़ाहट में
वो कौन सा शब्द है
बारिश जिसे जड़ों पर लिखती है
जो पढ़ा जाता है
डालियों पर पत्तियों की तरह

अगर पहाडों के रोने से बनी है नदी तो
चिडियों के हँसने से बना होगा आकाश
और यह जरूरी भी नहीं कि
महज़ प्यार करने से नहीं बनती है दुनिया

दुख
February 6th, 2009

किसी गर्भाशय में नौ महीने
रह कर नहीं जन्मता है वो
न है बैठता है गिद्ध की तरह
किसी सूखे वृक्ष पर मुर्दे के इंतज़ार में

दुख में इंतज़ार
इंतज़ार में दुख
बहुत फर्क है लेकिन
वह वहाँ भी नहीं होता

सांस छोड देने के बाद
सांस लेने के लिये उतावले
फेफडों के अंकुचन - संकुचन
मे भी नहीं होता

कहीं नहीं होता है वह
न खाली होने पर
न भरे होने पर

मगर वो होता है हर कहीं
विडम्बना की तरह

बाकी सब उसी के लिए होता है
धूप…हवा…हँसी… जीवन..
सब उसी के लिए होता है
उसी के प्रतिरोध में

प्रतिरोध उमंग है उल्लास है
प्रतिरोध जीवन है सांस है
और प्रतिरोध का भी दुख होता है
जैसे दुख का प्रतिरोध होता है

कुछ ऐसे जैसे तुम हो
जैसे मैं हूँ
जैसे हम दोनों नहीं है दुख हैं…
जैसे हम दोनों नहीं है प्रतिरोध हैं…

सिगरेट की तरह उँगलिओं में फंसा

तुम्हारा नाम सुलगता है

हर कश के साथ जलता है जिगर

और चढता है नशा

सारे कमरे में भर जाती हो

जब धुँए की तरह तुम

तब मिलता है सुकून

हर सांस के साथ आती जाती हो तुम

जानता हूँ यह धुँआ धोखा है

हाथ नहीं आएगा

फिर भी न जाने क्यों पीता हूँ

यह ज़िन्दगी.

*रचनाकाल: 1995.

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