परेड चौराहे से थोड़ा पहले
यतीम खाने के पास
मलय चक्रवर्ती एक ऐसे
अंधेरे मनहूस कमरे में रहता है
जिसमे या तो बेहोश होने की हद तक
शराब पी जा सकती है या
अपनी नसों, अतडियों
और छाती को फाड़ते हुए
रोया जा सकता है
इसके सिवा इस कमरे में कुछ और
नहीं किया जा सकता

यानी कि इसके सिवा जो कुछ भी है
वो इस कमरे का हिस्सा नहीं है

और मलय चक्रवर्ती इस कमरे में
पेंटिंग्स बनाता है लगातार,
बिना थके हुए बिना रुके हुए
रुकता है तो बेतहाशा सिगरेट पीता है
उसे बारूद की गंध और जलती हुई तीलियाँ बेहद अच्छी लगती हैं
या अपनी माँ और बाबा की फूल चढ़ी
तस्वीरों के बीच मे लगी काली की तस्वीर को
घूरता है देर तक अचानक बौखला उठता है
अपने सारे कपड़े उतार देता है
चिल्ला उठता है आओ काली आओ
मेरे साथ सम्भोग करो
फिर निढाल पड़ जाता एकदम
लेट जाता है अपनी पेंटिंग्स के बीच में

गोविंद भाई  अपने छाते और
छड़ी के साथ बरामदे में रहते हैं
छाता बारामदे की सीलन लगी दीवार पर टंगा है
और छड़ी ने घेर रखा है उनके बिस्तर का आधा हिस्सा

गोविंद भाई नशे में धुत रहते हैं हर वक़्त
कभी कभी छाते के पास जाते हैं
और छाते से कान लगा कर
ना जाने क्या सुनते रहते हैं

मलय चक्रवर्ती यह जानता है कि
सन बयासी के बाद
छाता कभी खुला नहीं
और गोविंद भाई कहते हैं कि
सन बयासी के बाद बारिश ही कहाँ हुई

गोविंद भाई के कई राज हैं
जिन्हे मलय चक्रवर्ती नहीं जानता
जैसे के छाते के भी भीतर
एक बहुत लंबा बहुत रेशमी बाल अटका है
जिस पर सन बयासी की बारिश ठिठक गई है
मलय चक्रवर्ती यह जानता है कि
गोविंद भाई कभी बिस्तर के उस पार नहीं जाते
बल्कि उस छड़ी पर अपना दाहिना हाथ रख कर
बड़े सुकून से सो जाते हैं
लेकिन मलय चक्रवर्ती ये नहीं जानता ये छड़ी उसी की है
जिसका रेशमी बाल छाते में अटका है
उस छड़ी पर हाथ फेरते हुये
गोविंद भाई न जाने कितनी सदियों पीछे मुस्कुराते हैं
एक गर्द भरी मुस्कान जिसमें कोई दर्द नहीं है

95/95 की एक अन्चीन्ही सुबह
मलय चक्रवर्ती और गोविंद भाई एक बिल्ली को दूध पिला रहे हैं
बिल्ली कुछ रोज़ में बच्चे जनने वाली है
पहले एक कुत्ता था इस घर में ‘टीमो’
अब टीमो की तस्वीर है

1996/97


September 29th, 2011
उंगलियों ने छुआ है पानी सा
ग़म ये कैसा है आसमानी सा

स्याह, भूरे, सलेटी भीग गये
रंग बरसा है कैसा धानी सा

सीना चौड़ा फुला के निकाला है
बुलबुला है तो मगर फ़ानी सा

क्यों कोई खौल कोई रवानी नहीं
खून कैसा है ये जवानी सा

धुलता जाता है वक़्त का चेहरा
दाग किसका है ये निशानी सा

कहीं भी छुप रहो  ढूँढ लेता है
लफ्ज़ दुश्मन है अपने मानी सा

मुझे पानी से बहुत डर लगता है
और ऊँचाई से भी

ठीक इस वक्त जब मैं आपको यह बात बता रहा हूँ
मैं एक बहुत ऊँची और ठहरी हुई पानी की लहर
पर बैठा हूँ सहमा हुआ

मुझे इस बात का बिल्क़ुल भी इल्म नहीं है कि
मैं यहाँ कैसे आ गया या कौन ले आया मुझे
या कौन छोड़  गया मुझे बिल्क़ुल असहाय

जैसे वो दोनो भालू खड़े हैं सड़क के बीचो – बीच
जिनकी पीठ के बाल छिले हुए हैं

सड़क जिसके दोनो ओर हरियाली है बेशुमार
हरियाली जिसे भालुओं ने पहली बार देखा है
और देख कर बदहवास हो गये हैं

अभी तो थमा हुआ है सब कुछ.

लेकिन अभी कोई आवाज़ लगाएगा
कोई डमरू बज़ाएगा

भालू भागेंगे कूदते हुए हरियाली में
जितना भागेंगे भालू
उतनी ही सड़क भागेगी उनके पैरों के नीचे
भालू और तेज़ भागेंगे तो और तेज़ भागेगी सड़क
भालू कभी नहीं पहुच पाएँगे हरियाली तक

आवाज़ सुन कर

मुझे भी मज़बूरन कूदना होगा दूर दूर फैले
बेहद गहरे भयानक काले पानी में
मेरे कूदने के बाद मेरे उपर कूदेगी बहुत देर से
ठहरी हुई बहुत उँची और डरावनी लहर

डूबते हुए मैं तड़पूँगा सांस लेने को

तुम थामोगी मेरा हाथ
कहोगी आ गये तुम
कितने देर से मैं बुला रही थी तुम्हें

अपनी याददाश्त पर ज़ोर डालने पर मुझे
याद आएँगे वो लगातार चलते हुए दिन
जब मिट्टी और पानी में घोला जा रहा था तुम्हे
पता नहीं किस किस के बीजों के साथ

मैं देखूँगा तुम्हारा घर..
तुम्हारे भयानक काले पानी का घर
मैं देखूँगा तुम्हारा साँस लेना
पानी के भीतर मैं सीखूंगा तुम्हारी तरह
साँस लेना बहुत कम हवा में

मैं मागूँगा तुमसे थोड़ी सी सुस्ताने की जगह

ऊपर ज़मीन पर
कूद रहे होंगे भालू और अब तक तो
मदारियों को भी लग चुका होगा पता
जुड़ने भी लगे होंगे तमाशबीन

हम एक दूसरे को देख कर मुसुकुराएँगे
हम मुसुकुराएँगे लेकिन मुस्कुराने से
हमारे डर नहीं जाते रहेंगे
जैसे याद नही करने से
नहीं जाता रहता है इतिहास

हम अपने डर पर काबू पाने के लिए
एक डुबकी और लगाएंगे
इस बार धरती के केंद्र की ओर जाएँगे
और इस बार यह नहीं कहेंगे कि
यही है हमारी आखरी डुबकी

और मेरा विश्वास कीजिए
वहाँ धरती के केंद्र में
कोई धधकती आग नही होगी

वहाँ उल्टा लटका होगा
एक प्राचीन तोता
टांय-टांय बोलता हुआ
सब कुछ सहन करते हुए
सब कुछ वहन करते हुए
सदियों तक मरते हुए
हम जाएगें उस केंद्र तक

और इस बार हम तोते का टेटुआ
दबा कर आएँगे….

मैं जानता हूँ
तुमने आग को धुएें से अलग कर दिया है
तुम्हारे कैमरे क़ैद करते है सिर्फ़ धुएें की छवियाँ
तुम्हारी कलम लिखती है सिर्फ़ धुएें के बयान
मैं जानता हूँ
तुम धुएें से घेर रहे हो हमें
तुम धुएें से घेर रहे हो ताकी
हमें नज़र ना आए आग
तुम चाहते हो कि इस
कदर फैल जाए धुआँ
की कोई पहचान ना सके
एक दूसरे का चेहरा
इंडिया गेट से ले कर इंटरनेट
तक तुमने फैला दिया है
मोमबत्तियों का धुआँ
और इस  धुएें को
तुम भरते जा रहे हो
हमारे जिस्म के हर छिद्र में
तुमने सीखा नहीं, ये हुनर तो
तुम्हारे पास हमेशा से था
तुम कहीं से भी उठा सकते थे धुआँ
किसी और का धुआँ किसी और के नाम पर
Read the rest of this entry »
कैसे कैसे गुल खिला रहा है
आग से आग को बुझा रहा है

अंगूठे काटे थे जिन्होने उसके
उन्ही को अँगूठा दिखा रहा है

लाल औ’ भगवा फाड़ के अब वो
काला झंडा उठा रहा है

खाल खींचना काम काम था उसका
क़लम को रांपी बना रहा है

« Previous Entries