रक्तकुंड
April 20th, 2010


जिस्म पर बम बंधवा
वो जा रहा है
खुदा से मिलने
कैसा खुदा है यार तू
बिना मरे मारे मिलता ही नहीं


अल्लाह बम बनाता है
ईसा मिसाइल
भगवान रचता है चक्रव्यूह
दुनियां डरती जाती है
दुनियां मरती जाती है


दुनियां भर में बिछी है लाशें
लाशों की जेब में है उनके
खुदाओं की तस्वीरें
सच कहते है ग्यानी जन
सब धर्म एक ही
मंजिल पर ले जाते हैं


मन्दिर के कलश पर
चर्च के क्रास पर
मस्ज़िद के गुम्बद पर
बेखौफ़ बीट करती हैं चिडियां
गाती हैं अपनी ही बोली में
अपने ही गीत
किसी भगवान की प्रार्थना नहीं करतीं
किसी खुदा का सिज़िदा नहीं करतीं
देखो हत्यारों कितनी खुश रह्ती हैं चिडियां

रात होने से पहले
कहीं खो कर
जो लौट आते हैं
उन्हे क्या पता
रात की कसीदाकारी

देखो मेरे पूरे वज़ूद पर बने हैं
शानदार बेल-बूटे

सुईयां भी चुभी है बे-हिसाब
उनका दर्द है लाज़वाब

नहीं लौटना है मुझे कहीं
रात खत्म होगी तो
सुबह आ ही जाएगी

प्रेम
February 20th, 2009

बादलों की गड़गड़ाहट में
वो कौन सा शब्द है
बारिश जिसे जड़ों पर लिखती है
जो पढ़ा जाता है
डालियों पर पत्तियों की तरह

अगर पहाडों के रोने से बनी है नदी तो
चिडियों के हँसने से बना होगा आकाश
और यह जरूरी भी नहीं कि
महज़ प्यार करने से नहीं बनती है दुनिया

दुख
February 6th, 2009

किसी गर्भाशय में नौ महीने
रह कर नहीं जन्मता है वो
न है बैठता है गिद्ध की तरह
किसी सूखे वृक्ष पर मुर्दे के इंतज़ार में

दुख में इंतज़ार
इंतज़ार में दुख
बहुत फर्क है लेकिन
वह वहाँ भी नहीं होता

सांस छोड देने के बाद
सांस लेने के लिये उतावले
फेफडों के अंकुचन - संकुचन
मे भी नहीं होता

कहीं नहीं होता है वह
न खाली होने पर
न भरे होने पर

मगर वो होता है हर कहीं
विडम्बना की तरह

बाकी सब उसी के लिए होता है
धूप…हवा…हँसी… जीवन..
सब उसी के लिए होता है
उसी के प्रतिरोध में

प्रतिरोध उमंग है उल्लास है
प्रतिरोध जीवन है सांस है
और प्रतिरोध का भी दुख होता है
जैसे दुख का प्रतिरोध होता है

कुछ ऐसे जैसे तुम हो
जैसे मैं हूँ
जैसे हम दोनों नहीं है दुख हैं…
जैसे हम दोनों नहीं है प्रतिरोध हैं…

« Previous Entries