रात होने से पहले
कहीं खो कर
जो लौट आते हैं
उन्हे क्या पता
रात की कसीदाकारी
देखो मेरे पूरे वज़ूद पर बने हैं
शानदार बेल-बूटे
सुईयां भी चुभी है बे-हिसाब
उनका दर्द है लाज़वाब
नहीं लौटना है मुझे कहीं
रात खत्म होगी तो
सुबह आ ही जाएगी
रात होने से पहले
कहीं खो कर
जो लौट आते हैं
उन्हे क्या पता
रात की कसीदाकारी
देखो मेरे पूरे वज़ूद पर बने हैं
शानदार बेल-बूटे
सुईयां भी चुभी है बे-हिसाब
उनका दर्द है लाज़वाब
नहीं लौटना है मुझे कहीं
रात खत्म होगी तो
सुबह आ ही जाएगी
बादलों की गड़गड़ाहट में
वो कौन सा शब्द है
बारिश जिसे जड़ों पर लिखती है
जो पढ़ा जाता है
डालियों पर पत्तियों की तरह
अगर पहाडों के रोने से बनी है नदी तो
चिडियों के हँसने से बना होगा आकाश
और यह जरूरी भी नहीं कि
महज़ प्यार करने से नहीं बनती है दुनिया
किसी गर्भाशय में नौ महीने
रह कर नहीं जन्मता है वो
न है बैठता है गिद्ध की तरह
किसी सूखे वृक्ष पर मुर्दे के इंतज़ार में
दुख में इंतज़ार
इंतज़ार में दुख
बहुत फर्क है लेकिन
वह वहाँ भी नहीं होता
सांस छोड देने के बाद
सांस लेने के लिये उतावले
फेफडों के अंकुचन - संकुचन
मे भी नहीं होता
कहीं नहीं होता है वह
न खाली होने पर
न भरे होने पर
मगर वो होता है हर कहीं
विडम्बना की तरह
बाकी सब उसी के लिए होता है
धूप…हवा…हँसी… जीवन..
सब उसी के लिए होता है
उसी के प्रतिरोध में
प्रतिरोध उमंग है उल्लास है
प्रतिरोध जीवन है सांस है
और प्रतिरोध का भी दुख होता है
जैसे दुख का प्रतिरोध होता है
कुछ ऐसे जैसे तुम हो
जैसे मैं हूँ
जैसे हम दोनों नहीं है दुख हैं…
जैसे हम दोनों नहीं है प्रतिरोध हैं…
सिगरेट की तरह उँगलिओं में फंसा
तुम्हारा नाम सुलगता है
हर कश के साथ जलता है जिगर
और चढता है नशा
सारे कमरे में भर जाती हो
जब धुँए की तरह तुम
तब मिलता है सुकून
हर सांस के साथ आती जाती हो तुम
जानता हूँ यह धुँआ धोखा है
हाथ नहीं आएगा
फिर भी न जाने क्यों पीता हूँ
यह ज़िन्दगी.
*रचनाकाल: 1995.