कौन है यह
August 13th, 2008

यह मै किसके पंजों में हूँ
कौन है यह जो मुझे
नोचे झिझोडे चबाए चला जा रहा है

कौन है यह जिसकी लार में
लिथडता जा रहा है मेरा ज़िस्म

कौन है यह जिसकी डकारों की आवृत्तियाँ
मेरी सांसों को उल्टा किये दे रहीं हैं

कौन है यह जो निकाल कर
खा रहा है मेरी आत्मा
कौन है यह जो तोड रहा है मेरी रीढ

कौन है यह जिसके आगे
मेन्यू कार्ड ले कर खडा हूँ मै

उसके लिये
किताब में छुपा कर
रखा है लड़की ने एक प्रेम पत्र
जिसे करती है प्रेम वो

पिता ने पढ़ी किताब
रख दी
प्रेम पत्र नहीं पढ़ा

भाई ने पढ़ी किताब
रख दी
प्रेम पत्र नहीं पढ़ा

माँ ने पढ़ी किताब
रख दी
प्रेम पत्र नहीं पढ़ा

दीदी की बिटिया ने
एक दिन पा ली किताब
छोटी सी बिटिया ने
फाड़ डाली समूची किताब
पन्ने-पन्ने उड़ा दिये हवा में
प्रेम पत्र की बना डाली नाव
घर के पीछे बहती नदी में
तैरा दी नाव

प्रेम पत्र का सफर शुरू हो गया है
बिटिया नाव के पीछे-पीछे
दौड़ रही है

लड़की कैलेंडर मे तारीख बदल रही है।

रचना काल 1997

मुद्दतों बाद फिज़ा बदली है
आज होठों पे’ हँसी असली है

सूत रिश्तों का घेर लेता है
सूत कच्चा है इंसा तकली है

मेरा माज़ी गुज़र गया शायद
वो यह कहती है कैसी पगली है

राह भटके तो खो गई मंज़िल
कहने वालों की बात नकली है

जिस्म नीला पड़ा है मछली का
प्यास होगी इधर से निकली है

मंडी रैप
June 30th, 2008

भीड भडक्का
शोर सडक का
बैगन भरता
दाल तडक्का
घंटी शंटी रेलम्पेल
मची है कैसी ठेलमठेल
आओ मिल कर बेंचे तेल

दान धरम
ईमान के धंधे
पापी नीच
बे ईमान
ये गन्दे
खेले मिल कर मौत के खेल
आओ मिल कर बेंचे तेल

अन्नो बन्नो
शबनम शन्नो
राधा रानी
देवी दुखियारी
सबको बना दिया है रेल
आओ मिल कर बेंचे तेल

अरबन शरबन
गरिबा गुरुबन
चले जा रहे
आँखे मीचे
धक्कमपेल लगी है सेल
आओ मिल कर बेंचे तेल

एक सैलानी चहक
नाव में बैठ कर
नदी के उस पार चली गई

मल्लाह की हथेली में
घट्ठे हैं दुख

धोबी पछीटता है
बेरहमी से कपडे
पानी में घुलता है
जाने कितना दुख

पानी में बहते हैं बहाए गए दुख
कल-कल कल-कल

फकीर गाता है मुक्ति का गीत
मुक्ति का गीत गाते है सौदागर भी
जल्लाद और सरकारें भी

मल्लाह लगाता है उगलियों में
गर्म कड्वा तेल
गाता है बिरहा

नदी चुपचाप सुनती है
कल-कल कोलाहल.

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